प्रमंडलTirhutSaranDarbhangaKosiPurniaBhagalpurMungerPatnaMagadh

पितृपक्ष मेला, गया

Pitrapaksh Mela, Gaya

कब

आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृपक्ष) — सोलह दिन, पूर्णिमा से अमावस्या तक

तिथि स्विस एफ़ेमेरिस पंचांग से गणना की गई है — पंचांग देखें।

कहाँ

गया (गयाजी) — विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी व अक्षयवट

गया ज़िले की खबरें →

पितृपक्ष मेला गया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है। मान्यता है कि गया में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है, और इसी विश्वास पर सोलह दिनों तक देश-विदेश से लाखों लोग यहाँ आते हैं। गया को इसी कारण 'गयाजी' और मोक्षभूमि कहा जाता है — यह बिहार का एकमात्र स्थान है जिसकी पहचान पूरे भारत में श्राद्धकर्म से जुड़ी है।

महत्व

  • पिंडदान का प्रमुख स्थान — शास्त्रीय परंपरा में गया श्राद्ध को विशेष फलदायी माना गया है।
  • विष्णुपद मंदिर इस कर्मकांड का केंद्र है; परिसर के पास ही फल्गु नदी का तट है।
  • अक्षयवट को पिंडदान की अंतिम वेदी माना जाता है — यहीं संकल्प पूरा होता है।
  • परंपरा में गया क्षेत्र की अनेक वेदियाँ हैं, और तीर्थयात्री अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक, तीन या अधिक दिन का कर्म करते हैं।

मेले में क्या होता है

  • तीर्थयात्री स्थानीय पंडों (गयापाल) के माध्यम से संकल्प लेकर तर्पण और पिंडदान करते हैं।
  • फल्गु तट, विष्णुपद और अक्षयवट पर सबसे अधिक भीड़ रहती है।
  • जिला प्रशासन सोलह दिनों के लिए अस्थायी शिविर, पेयजल, चिकित्सा और यातायात व्यवस्था करता है।
  • शहर के धर्मशालाओं और ठहरने के स्थानों में इस अवधि में सबसे अधिक मांग रहती है।

कैसे पहुँचें

  • रेल: गया जंक्शन देश के बड़े स्टेशनों से सीधा जुड़ा है और मंदिर क्षेत्र से कुछ ही दूरी पर है।
  • वायु: गया में हवाई अड्डा है, जो इस मौसम में घरेलू व बौद्ध परिपथ की उड़ानों से व्यस्त रहता है।
  • सड़क: पटना से गया नियमित बस व टैक्सी सेवा से जुड़ा है।

ज़रूरी बातें

  • कर्मकांड की दर पहले तय कर लें — पंडों की दक्षिणा निर्धारित नहीं होती और मोलभाव सामान्य है।
  • ठहरने की बुकिंग पहले करें; पितृपक्ष में गया के कमरे सबसे पहले भर जाते हैं।
  • फल्गु नदी में पानी मौसम पर निर्भर करता है — तट की स्थिति हर साल एक सी नहीं रहती।
  • भीड़ सुबह सबसे अधिक होती है; बुजुर्ग यात्रियों के साथ समय और विश्राम का ध्यान रखें।

सामान्य प्रश्न

पितृपक्ष मेला कब लगता है?

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में, भाद्रपद पूर्णिमा के बाद से अमावस्या तक — कुल सोलह दिन। तारीखें हर साल पंचांग के अनुसार बदलती हैं।

गया में पिंडदान क्यों किया जाता है?

परंपरा में गया को पितरों की मुक्ति का स्थान माना गया है, इसलिए श्राद्ध और पिंडदान के लिए यह सबसे प्रमुख तीर्थ है।

पितृपक्ष में गया के मुख्य स्थान कौन हैं?

विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी का तट और अक्षयवट — तीनों इस कर्म के केंद्र माने जाते हैं।

पिंडदान में कितने दिन लगते हैं?

यह संकल्प पर निर्भर है — एक दिन से लेकर सोलह दिन तक का कर्म किया जाता है।

गया कैसे पहुँचें?

गया जंक्शन रेल से, गया हवाई अड्डा वायुमार्ग से, और पटना से सड़क मार्ग — तीनों विकल्प उपलब्ध हैं।

अंतिम अपडेट: 2026-10