सामा-चकेवा
Sama Chakeva
कब
कार्तिक — छठ के बाद से कार्तिक पूर्णिमा तक
तिथि स्विस एफ़ेमेरिस पंचांग से गणना की गई है — पंचांग देखें।
कहाँ
मिथिला क्षेत्र — घर के आँगन और गाँव के खुले स्थान
सामा-चकेवा मिथिला का भाई-बहन के स्नेह का लोकपर्व है, और इसकी सबसे सुंदर बात यह है कि इसमें मंदिर या पुरोहित की कोई भूमिका नहीं — यह पूरी तरह बहनों का, गीतों और मिट्टी की मूर्तियों का पर्व है। छठ के बाद से कार्तिक पूर्णिमा तक बहनें मिट्टी से सामा, चकेवा और साथ के पात्र बनाती हैं, रोज़ शाम गीत गाती हैं, और अंतिम दिन विदाई देती हैं।
महत्व
- मिथिला का लोकपर्व — मैथिली गीतों की परंपरा इसका मुख्य स्वरूप है।
- भाई की दीर्घायु और भाई-बहन के संबंध की कामना इसका भाव है।
- मूर्तियाँ मिट्टी की बनाई जाती हैं और अंत में विसर्जित कर दी जाती हैं।
- यह पर्व घर और गाँव का है — इसका कोई बड़ा सार्वजनिक आयोजन नहीं होता।
मेले में क्या होता है
- बहनें मिट्टी से सामा, चकेवा, चुगला और अन्य पात्र बनाती और सजाती हैं।
- शाम को समूह में बैठकर पारंपरिक मैथिली गीत गाए जाते हैं।
- अंतिम दिन — कार्तिक पूर्णिमा पर — विदाई का गीत गाकर मूर्तियाँ विसर्जित की जाती हैं।
- भाई को प्रसाद दिया जाता है और उसकी लंबी आयु की कामना की जाती है।
कैसे पहुँचें
- यह घर में मनाया जाने वाला पर्व है — कोई एक आयोजन स्थल नहीं।
- मिथिला क्षेत्र — मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर और आसपास — में यह सबसे व्यापक है।
ज़रूरी बातें
- मूर्तियाँ बनाने के लिए चिकनी मिट्टी पहले से जुटा लें; बाज़ार में तैयार सेट भी मिलते हैं।
- विसर्जन के लिए नज़दीकी तालाब या नदी का सुरक्षित घाट चुनें।
- गीतों की परंपरा घर-घर अलग है — परिवार की बड़ी महिलाओं से सीखना सबसे अच्छा तरीका है।
सामान्य प्रश्न
सामा-चकेवा कब मनाया जाता है?
कार्तिक मास में, छठ के बाद से कार्तिक पूर्णिमा तक — कई दिनों का पर्व है।
सामा-चकेवा किसका पर्व है?
मिथिला का लोकपर्व, जो भाई-बहन के स्नेह और भाई की दीर्घायु की कामना से जुड़ा है।
इसमें क्या किया जाता है?
मिट्टी से सामा-चकेवा की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, शाम को मैथिली गीत गाए जाते हैं, और अंतिम दिन विदाई देकर विसर्जन होता है।
यह कहाँ मनाया जाता है?
मुख्यतः मिथिला क्षेत्र में — मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर और आसपास के ज़िलों में।
अंतिम अपडेट: 2026-10