खटवा एप्लिक कला
Khatwa Applique Work
GI टैग 2008हस्तशिल्प
खटवा कपड़े पर कपड़ा जोड़ने की कला है — एक रंग के कपड़े से आकृति काटकर दूसरे रंग के आधार पर सिल दी जाती है, और इसी से डिज़ाइन बनता है। यह कढ़ाई नहीं, कतरन और सिलाई का काम है, इसलिए इसमें आकृतियाँ साफ़ और सपाट दिखती हैं। पारंपरिक रूप से इसका सबसे बड़ा उपयोग तंबू, शामियाना और छतरियों में होता रहा है। इसे 2008 में GI टैग मिला।
खासियत क्या है
- डिज़ाइन कढ़ाई से नहीं, कपड़े की कतरन जोड़कर बनता है — यही एप्लिक की परिभाषा है।
- आकृतियाँ प्रायः बड़ी और स्पष्ट होती हैं, इसलिए दूर से भी दिखती हैं।
- बड़े पैमाने पर काम होता है — तंबू और शामियाना जैसे विशाल सतहों पर।
- घरेलू उपयोग में इसका रूप छोटा होता है — वॉल हैंगिंग, चादर, पर्दे और थैले।
कैसे बनता है
- डिज़ाइन के अनुसार रंगीन कपड़े से आकृतियाँ काटी जाती हैं।
- आधार कपड़े पर उनका स्थान तय कर टाँका जाता है।
- किनारों को मोड़कर सिला जाता है जिससे धागे न निकलें।
- बड़े शामियाने में अनेक पैनल अलग-अलग बनाकर अंत में जोड़े जाते हैं।
कहाँ से आता है
- यह बिहार में व्यापक रूप से फैली परंपरा है और GI पंजीकरण में इसे किसी एक ज़िले से नहीं बाँधा गया।
- तंबू-शामियाना के काम से जुड़े कारीगर परिवार इसे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं।
खरीदते समय क्या देखें
- किनारों की सिलाई देखें — अच्छी खटवा में किनारे मुड़े और मज़बूत सिले होते हैं।
- कपड़े का रंग पक्का हो; शामियाने का सामान धूप और बारिश दोनों झेलता है।
- आकृति के कोने साफ़ कटे हों तो काम अधिक कुशल माना जाता है।
- बड़े ऑर्डर में माप और पैनल जोड़ने का तरीका पहले तय कर लें।
सामान्य प्रश्न
खटवा कला क्या है?
कपड़े से आकृति काटकर दूसरे कपड़े पर सिलने की एप्लिक परंपरा, जिससे डिज़ाइन बनता है।
खटवा को GI टैग कब मिला?
2008 में।
खटवा का पारंपरिक उपयोग क्या है?
तंबू, शामियाना और छतरियाँ; घरेलू स्तर पर वॉल हैंगिंग, पर्दे और चादर।
खटवा और कढ़ाई में अंतर क्या है?
कढ़ाई धागे से बनती है; खटवा में कपड़े की कतरन काटकर जोड़ी जाती है।
बिहार के और GI उत्पाद
अंतिम अपडेट: 2026-10