मधुबनी पेंटिंग (मिथिला चित्रकला)
Madhubani Painting
मधुबनी पेंटिंग मिथिला क्षेत्र की लोक चित्रकला है, जिसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है। यह मूल रूप से कागज़ या कैनवास की कला नहीं थी — यह घर की दीवारों और विवाह के 'कोहबर घर' की कला थी, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाएँ एक-दूसरे से सीखती रहीं। बाद में जब इसे कागज़ और कपड़े पर उतारा गया, तब यह मिथिला से निकलकर देश और दुनिया के संग्रहालयों तक पहुँची।
खासियत क्या है
- कोई खाली जगह नहीं छोड़ी जाती — बची जगह फूल, पत्ती, पक्षी या रेखांकन से भर दी जाती है।
- आकृतियाँ प्रायः दोहरी रेखा से घेरी जाती हैं, और चित्र के चारों ओर अलंकृत बॉर्डर बनाया जाता है।
- रंग परंपरागत रूप से प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते थे — हल्दी, कालिख, पत्तों और फूलों से।
- शैलियाँ अलग-अलग हैं — भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर — और हर शैली की पहचान अलग है।
- यह बिहार की पहली GI-पंजीकृत कलाओं में है, जिसका पंजीकरण 2007 में हुआ।
कैसे बनता है
- रेखांकन पहले किया जाता है — पारंपरिक रूप से बाँस की कलम या तीली से, और अब ब्रश से भी।
- कचनी शैली में काम मुख्यतः रेखाओं से होता है; भरनी शैली में आकृतियाँ रंग से भरी जाती हैं।
- कागज़ या कपड़े को पहले तैयार किया जाता है, कई बार गोबर-मिट्टी के लेप से, जिससे सतह को पारंपरिक रंगत मिलती है।
- विषय प्रायः पौराणिक और प्राकृतिक होते हैं — शिव-पार्वती, राम-सीता, दुर्गा, मछली, तोता, कमल, बाँस और सूर्य-चंद्र।
कहाँ से आता है
- मधुबनी ज़िला इस कला का केंद्र है, और दरभंगा क्षेत्र में भी यह परंपरा गहरी है।
- जितवारपुर और रांटी जैसे गाँव इस कला के चर्चित केंद्र माने जाते हैं।
- मिथिला की अनेक महिला चित्रकारों को राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं, जिससे यह कला घर से निकलकर पेशा बनी।
खरीदते समय क्या देखें
- हाथ से बनी पेंटिंग में रेखाएँ पूरी तरह एक-सी नहीं होतीं — यही उसके हस्तनिर्मित होने का संकेत है।
- प्रिंट और हस्तनिर्मित में अंतर देखें: प्रिंट में रंग की परत सपाट होती है और रेखा में दबाव नहीं दिखता।
- कलाकार का नाम और गाँव पूछें — प्रामाणिक काम बेचने वाले यह बताने में संकोच नहीं करते।
- मधुबनी और दरभंगा के सहकारी केंद्रों व कलाकारों से सीधी खरीद में दाम और प्रामाणिकता दोनों बेहतर रहते हैं।
GI क्षेत्र के ज़िले
सामान्य प्रश्न
मधुबनी पेंटिंग क्या है?
मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक लोक चित्रकला, जो मूल रूप से घर की दीवारों और कोहबर घर पर बनाई जाती थी और अब कागज़ व कपड़े पर भी बनती है।
मधुबनी पेंटिंग को GI टैग कब मिला?
2007 में।
मधुबनी पेंटिंग की शैलियाँ कौन-कौन हैं?
मुख्यतः भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर।
मधुबनी पेंटिंग कहाँ बनती है?
मुख्य रूप से मधुबनी ज़िले में, और दरभंगा क्षेत्र में भी — जितवारपुर और रांटी इसके चर्चित गाँव हैं।
असली मधुबनी पेंटिंग कैसे पहचानें?
हाथ की रेखा में दबाव और थोड़ी असमानता दिखती है, रंग की परत सपाट नहीं होती, और कलाकार का नाम-गाँव बताया जा सकता है।
बिहार के और GI उत्पाद
अंतिम अपडेट: 2026-10